Tuesday, October 26, 2010

भटका हुआ देवता

ये तस्वीर हरिद्वार के शांति कुञ्ज की है . माधव का मुंडन कराने जब मै हरिद्वार गया था , ये तब की तस्वीर है ."भटका हुआ देवता"के नीचे कई आईने रखे हुवे है . इस आईने में खुद को देखना है और अपने अंदर के देवता को ढूढना है और भटकाव को महसूस करना है . मनुष्य देवत्व के बहुत करीब हो़ता है, हमें शायद अपने अंदर झांकने की जरुरत है .

इस बिषय पर आपके विचारों की अपेक्षा करता हूँ.





10 Comments:

arvind said...

meri prakishit kaavy "माँ ने कहा था "से
राम और रावण व्यक्ति नही हैँ
पुत्र द्वन्द हैँ विचार विरोधी
वास ये करते प्रत्येक हृदय मेँ
लडते हैँ ये हैँ अवरोधी.

अविनाश वाचस्पति said...

देवता को ढूंढना है
या ढूंढना है बालों को
आओ बंधु, गोरी के गांव चलें
पर आप सब मेरे साथ चलिए।

arganikbhagyoday said...

kal to hamesha rahata hai aur rahega yah sach hai !

शिक्षामित्र said...

मनुष्य अपने मूल रूप में साक्षात् देवता ही है।

महाशक्ति said...

आपकी इस पोस्‍ट ने बिल्‍कुल सही कहा

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

आपके जीवन में बारबार खुशियों का भानु उदय हो ।
नववर्ष 2011 बन्धुवर, ऐसा मंगलमय हो ।
very very happy NEW YEAR 2011
आपको नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें |
satguru-satykikhoj.blogspot.com

अनुपमा पाठक said...

इश्वर तो हृदय में विद्यमान हैं ही...

JHAROKHA said...

anupma ji ki baat se mai sahmat hun .
ishwar to sabke man me hi rahta hai bas use dhyan se yaad karne ki jarurat bhar hai
kyon ki kaha gaya hai---
kasturi kundalini basai mrig dhudhe van mahi
aise ghat- ghat ram hai ,duniya dekhe nahi.
bahit hi aur jankari purn prastuti.
aabhar
poonam

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

देवता तो हर एक के अन्दर वास करता है,

मुझ में, तुम में, सब में,

सतीश सक्सेना said...

हम इसे ढूंढ ही तो नहीं पाते ....
शुभकामनायें !