Pages

Monday, March 22, 2010

धरती के लिए

Saturday, March 13, 2010

सबसे बड़ा टिकट


आई पी एल आज से शुरू हो रहा है और आई पी एल इन दो साल में ही विश्व स्तर पर जितना मुकाम हासिल किया है इसका उदाहरण देखने को मिला आज . सबसे बड़ा टिकट के नाम से अपने को प्रचारित करने वाले इस क्रिकेट टूर्नामेंट का एक और लैंड मार्क , गूगल ने आज अपने लोगो को क्रिकेट स्टाइल में पेश किया . ये हुई न बात ?

Thursday, February 25, 2010

स्व इन्द्र कली देवी
आज से ठीक एक साल पहले मेरी दादी का इंतकाल हुआ था . मेरी दादी का नाम इन्द्रकली देवी था. बड़ी सुन्दर सी थी वो , झुरियाँ से उसकी त्वचा भरी पडी थी . मैंने उनको तब से देखा जब घर की बागडोर उनके हाथ में थी , धीरे धीरे बागडोर बहुएं छीनने लगी ,उसके बच्चें अलग होने लगे , आँगन में दीवारें खींच गई , खेतों में मेढ़े डाल दी गई और सब कुछ बाट लिए गए , पांच बेटे वाली माँ अकेले रहने लगी . पर दादी आत्मनिर्भर थी कभी भी दुसरो के आगे हाथ नहीं पसारा . हां नाती पोतो के लिए जान भी हाजिर करने वाली औरत थी वो. एक वृद्ध होती स्त्री क्या सोचती है अपने बच्चों के बारे में जो उससे अलग अपना एक संसार बना लेते हैं?
दादी का मुझसे बहुत स्नेह था , और स्नेह भी वह नहीं , जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है , उसका स्नेक मूक था , खूब ठोस , रस और स्वाद से भरा हुआ

यहीं से शुरू होगा
इतिहास पिछला बाकी सारा
पीछे छूट पलट दिया जाएगा
सरकारें
बदल दी जाएंगी
स्मृतियां रहेंगी - मगर रोती हुई - किसी कोने या कूडेदान में

आख़िरी बार मै दादी से मिला था जब दादा का देहांत हुआ था ( अगस्त २००९ ) , मैंने उसे दादा के लिए रोते विलखते हुवे देखा आखिर करीब साठ- सत्तर साल का रिश्ता जो था . मैंने उसी दिन महसूस किया की पति- पत्नी एक दुसरे के लिए कितने अहम् होते है , कितना अहम् होता है एक दुसरे का साथ, एक दुसरे पर हक़ , उस दिन जीवन का एक अलग ही अनुभव था, उस दिन काल की निर्दयता पर क्रोध आया और खुद को असहाय महसूस किया . आज दादी गए को गए एक साल हो गए, घर के लोग उस बुढियां को भूल गए है , शायद कभी कभी बातों के दौर में दादी का नाम आता हैपर मेरे दिल में मेरी दादी आज भी ज़िंदा है और उनकी स्मृतियाँ हमेशां ज़िंदा रहेंगी
 

Sample text

Sample Text