यह तस्वीर / कार्टून आज टाईम्स ऑफ़ इंडिया के फ्रंट पेज पर छपी है। 2009 के जनादेश ने सबकुछ बदल डाला है. जो कल तक किंग और KINGMAKER बनाना चाहते थे, वो सरेंडर कर चुके है. यह तस्वीर ही सब कुछ बयान कर रही है.भारत और भारत की जनता को साधुवाद !Wednesday, May 20, 2009
ब्लैकमेल-प्रूफ़ सरकार
यह तस्वीर / कार्टून आज टाईम्स ऑफ़ इंडिया के फ्रंट पेज पर छपी है। 2009 के जनादेश ने सबकुछ बदल डाला है. जो कल तक किंग और KINGMAKER बनाना चाहते थे, वो सरेंडर कर चुके है. यह तस्वीर ही सब कुछ बयान कर रही है.भारत और भारत की जनता को साधुवाद !Monday, May 4, 2009
जुगाड़ क्रिकेट / आई पी एल
जुगाड़ क्रिकेट / आई पी एल
आज कल आई पी एल का बुखार देस पर छाया हुआ है है. आई पी एल "हर कीमत " , जैसे एक टी वी न्यूज चैनेल पर टैग लाइन आता है "खबर हर कीमत पर ", वैसे ही ललित मोदी ने कहा "आई पी एल हर कीमत पर". केंद्र सरकार, गृह मंत्री से लड़ बैठे , निजी सुरक्षा एजेंसियों के बल पर भारत में आई पी एल करने का प्रस्ताव भेज डाला. धर्मशाला में मैच करने की बात कही गयी , फिर भी सरकार नहीं मानी तो आई पी एल को भारत से बाहर ले गए.
कुल मिलाकर क्रिकेट होना चाहिए चाहे कितना भी जुगाड़ करना पड़े . आखिरकार क्रिकेट राष्ट्रधर्म जो बन चूका है, प्रीटी जिंटा के तो यहाँ तक कह दिया " thanx god हर साल election नहीं होता ". मुझे याद आती है उस दौर की १९९० जब हम गलीयो में जुगाड़ क्रिकेट खेलते थे. उस क्रिकेट में विकेटकीपर , स्लीप का कोई स्थान नहीं होता था. विकेट किसी दीवाल पर तीन लाईने खींच कर बना दी जाती थी. कभी कभी तो सड़क के फर्श पर ही तीन लाईने खींच कर विकेट बना दी जाती थी . L.B.W का कोइ प्रावधान नहीं होता था. साफ़ रन आउट होने पर कोइ आउट होने को तैयार नहीं होता था. टीम में शामिल हर प्लेयर को बैटिंग और बालिंग दोनों जरुर मिलना चाहिए वर्ना कैप्टेन की शामत आ जाती थी. बालिंग में हरेक बालर फास्ट बालिंग ही करता था. स्पिनर की तो कोई इज्जत ही नहीं थी. T-२० को आज की खोज कहा जा रहा है हम तो उस दौर में ही T-5, T-10,T-१५ खेलते थे. कभी दोनों बैट्समैन के पास बैट नहीं होता था . Non - striker end वाला बैट्समैन बिना बैट के ही खेलता था और हरेक बाल के बीच में बैट्समैन बैट बदलते थे. उस दौर में शायद पुरी टीम मिलकर दो बैट नहीं खरीद पाते थे .
कहा जाता है के क्रिकेट अमीरों का खेल है. क्रिकेट में बहुत सारा accesories होता है और गरीब ईस खेल को नहीं खेल सकते है. ईस समस्या का हल भी निकाल लिया या यू कहे बाज़ार ने काफी मदद की. दरअसल क्रिकेट की ड्यूज बाल काफी कठोर होती थी और बिना पेड / ग्लब्स / सुरक्षा साधनों के बिना उस बाल से खेलना काफी मुश्किल होने लगा. शायद भारतीय प्लास्टिक कम्पनियों को यह बात समझ में आ गई और आगमन हुआ प्लास्टिक बाल का , आकार में थोड़ी छोटी प्लास्टिक बाल काफी कठोर थी और उछाल ड्यूज बाल जैसी ही थी खेलने में ज्यादा चोट लगने की संभावना नहीं थी. बाद में यह बाल भी कुछ ज्यादा नहीं जची ,बाज़ार एक बार फिर आगे आया और पेस की कॉस्को बाल/ टेनिस बाल.प्लास्टिक बाल के बाद कोसको बाल/ टेनिस बाल का ही चलन हुआ , यहाँ बाजार ने एक नई क्रांति ला दी . टेनिस बाल , क्रिकेट के काम आने लगी .
क्रिकेट और वालीवुड ने भारत के एकीकरण में सरदार पटेल से भी ज्यादा योगदान दिया है . युवराज के छक्को को देखकर मुस्लमान भी उतना ही खुस / रोमांचीत होता है जितना एक हिन्दू , युसूफ पठान के छक्को का आनंद हर भारतीय लेता है. आई पी एल तो इससे भी एक कदम आगे है, यहाँ तो मेलबोर्न से मुंबई तक ट्रेन चलती है, पाकिस्तान की रजिया सहवाग के लिए रोजा रखती है , संगकारा के लिए सारा पंजाब पिंड माँगता है , शेन वॉर्न के लिए पूरा राजस्थान "हल्ला बोळ" गाता है. मखाया एंटीनी "गाता रहे मेरा दिल " गाना गाते है. पंजाब के हरभजन सिंह जब केरला के श्रीसंत को थप्पड़ मारते है तो मोहाली के मैदान पर उनकी हुटिंग होती है . मैथ्यू हेडेन मुरलीधरन को कैच लेने पर खुशी में गले से लगा लेते है . ललित मोदी साउथ अफ्रीका में मैदान में औटोग्राफ देते नजर आते है . ये सब कुछ बस यही होता है ! बस आई पी एल के दर पर. काश ऐसी बाते शायद हर क्षेत्र में होती .
आई पी एल "हर कीमत पर" कराने की यह जिद तारीफ़ के काबिल है, यही आलम रहा तो शायद नोबेल प्राईज सेलेक्सन कमीटी को अगली साल के नोबेल प्राईज (Peace) के लिए नोमिनेशन में आई पी एल का नाम भी प्रस्तावित होना चाहिए. आई पी एल का एक नाम और होना चाहिए International Peace league.
आमीन !s
आज कल आई पी एल का बुखार देस पर छाया हुआ है है. आई पी एल "हर कीमत " , जैसे एक टी वी न्यूज चैनेल पर टैग लाइन आता है "खबर हर कीमत पर ", वैसे ही ललित मोदी ने कहा "आई पी एल हर कीमत पर". केंद्र सरकार, गृह मंत्री से लड़ बैठे , निजी सुरक्षा एजेंसियों के बल पर भारत में आई पी एल करने का प्रस्ताव भेज डाला. धर्मशाला में मैच करने की बात कही गयी , फिर भी सरकार नहीं मानी तो आई पी एल को भारत से बाहर ले गए.
कुल मिलाकर क्रिकेट होना चाहिए चाहे कितना भी जुगाड़ करना पड़े . आखिरकार क्रिकेट राष्ट्रधर्म जो बन चूका है, प्रीटी जिंटा के तो यहाँ तक कह दिया " thanx god हर साल election नहीं होता ". मुझे याद आती है उस दौर की १९९० जब हम गलीयो में जुगाड़ क्रिकेट खेलते थे. उस क्रिकेट में विकेटकीपर , स्लीप का कोई स्थान नहीं होता था. विकेट किसी दीवाल पर तीन लाईने खींच कर बना दी जाती थी. कभी कभी तो सड़क के फर्श पर ही तीन लाईने खींच कर विकेट बना दी जाती थी . L.B.W का कोइ प्रावधान नहीं होता था. साफ़ रन आउट होने पर कोइ आउट होने को तैयार नहीं होता था. टीम में शामिल हर प्लेयर को बैटिंग और बालिंग दोनों जरुर मिलना चाहिए वर्ना कैप्टेन की शामत आ जाती थी. बालिंग में हरेक बालर फास्ट बालिंग ही करता था. स्पिनर की तो कोई इज्जत ही नहीं थी. T-२० को आज की खोज कहा जा रहा है हम तो उस दौर में ही T-5, T-10,T-१५ खेलते थे. कभी दोनों बैट्समैन के पास बैट नहीं होता था . Non - striker end वाला बैट्समैन बिना बैट के ही खेलता था और हरेक बाल के बीच में बैट्समैन बैट बदलते थे. उस दौर में शायद पुरी टीम मिलकर दो बैट नहीं खरीद पाते थे .
कहा जाता है के क्रिकेट अमीरों का खेल है. क्रिकेट में बहुत सारा accesories होता है और गरीब ईस खेल को नहीं खेल सकते है. ईस समस्या का हल भी निकाल लिया या यू कहे बाज़ार ने काफी मदद की. दरअसल क्रिकेट की ड्यूज बाल काफी कठोर होती थी और बिना पेड / ग्लब्स / सुरक्षा साधनों के बिना उस बाल से खेलना काफी मुश्किल होने लगा. शायद भारतीय प्लास्टिक कम्पनियों को यह बात समझ में आ गई और आगमन हुआ प्लास्टिक बाल का , आकार में थोड़ी छोटी प्लास्टिक बाल काफी कठोर थी और उछाल ड्यूज बाल जैसी ही थी खेलने में ज्यादा चोट लगने की संभावना नहीं थी. बाद में यह बाल भी कुछ ज्यादा नहीं जची ,बाज़ार एक बार फिर आगे आया और पेस की कॉस्को बाल/ टेनिस बाल.प्लास्टिक बाल के बाद कोसको बाल/ टेनिस बाल का ही चलन हुआ , यहाँ बाजार ने एक नई क्रांति ला दी . टेनिस बाल , क्रिकेट के काम आने लगी .
क्रिकेट और वालीवुड ने भारत के एकीकरण में सरदार पटेल से भी ज्यादा योगदान दिया है . युवराज के छक्को को देखकर मुस्लमान भी उतना ही खुस / रोमांचीत होता है जितना एक हिन्दू , युसूफ पठान के छक्को का आनंद हर भारतीय लेता है. आई पी एल तो इससे भी एक कदम आगे है, यहाँ तो मेलबोर्न से मुंबई तक ट्रेन चलती है, पाकिस्तान की रजिया सहवाग के लिए रोजा रखती है , संगकारा के लिए सारा पंजाब पिंड माँगता है , शेन वॉर्न के लिए पूरा राजस्थान "हल्ला बोळ" गाता है. मखाया एंटीनी "गाता रहे मेरा दिल " गाना गाते है. पंजाब के हरभजन सिंह जब केरला के श्रीसंत को थप्पड़ मारते है तो मोहाली के मैदान पर उनकी हुटिंग होती है . मैथ्यू हेडेन मुरलीधरन को कैच लेने पर खुशी में गले से लगा लेते है . ललित मोदी साउथ अफ्रीका में मैदान में औटोग्राफ देते नजर आते है . ये सब कुछ बस यही होता है ! बस आई पी एल के दर पर. काश ऐसी बाते शायद हर क्षेत्र में होती .
आई पी एल "हर कीमत पर" कराने की यह जिद तारीफ़ के काबिल है, यही आलम रहा तो शायद नोबेल प्राईज सेलेक्सन कमीटी को अगली साल के नोबेल प्राईज (Peace) के लिए नोमिनेशन में आई पी एल का नाम भी प्रस्तावित होना चाहिए. आई पी एल का एक नाम और होना चाहिए International Peace league.
आमीन !s
Friday, October 24, 2008
Sunday, August 31, 2008
भाषा निरपेक्षता

राजनीति का एक मिजाज ये भी है .सिर्फ़ चार ही क्यो भाई ,भारतीय संविधान में तो २२ भाषा का जिक्र है ,तो सभी भाषा की लिपि में लिखा बोर्ड होना चाहिए क्योकी दिल्ली में तो सभी भाषा और प्रांत के लोग रहते है और एक बात तो भूल गए ही गए हमारी दिल्ली में तो ८ फीसदी लोग अनपढ़ भी है तो उनके लिए भी तो कोई इंतजाम होना चाहिए . तभी तो राज्य या सरकार भाषा निरपेक्ष कही जाएगी .
Monday, August 18, 2008
“जिन्दगी क्या है जानने के लिए जिन्दा रहना बहुत जरुरी है”
साँप के मुहँ मे फसा मेडक अपने आस पास उड्ती मख्यियो को निगलना चाहता है,
ऎसा ही हमारा जीवन है जो पत्थर कि मुर्ति कुछ खा नही सकती, उस पर मेवे और फल डाले जाते है, और भुखी आत्मा को “मार – मार” कह भगा दिया जाता है .
पिछली 3 तारीख को मेरे दादाजी(1927-2008) का स्वर्गवास हुआ, शमशान घाट पर जब मुखाग्नि देने का समय हुआ तब अग्नि अर्पित करने वाले महाश्य धन की जिद करने लगे,कहने लगे 5001 रु लुगा तभी अग्नि दुँगा, लोक परम्परा के मुताबिक शमशान घाट का रखवाला ही अग्नि देता है. बहरहाल काफी सौदेबाजी के बाद बात 501 पर तय हुई, बाकी के पैसे तेरहवी के दिन लेने की शर्त पर महाश्य ने अग्नि दी.
ऎसा ही हमारा जीवन है जो पत्थर कि मुर्ति कुछ खा नही सकती, उस पर मेवे और फल डाले जाते है, और भुखी आत्मा को “मार – मार” कह भगा दिया जाता है .
पिछली 3 तारीख को मेरे दादाजी(1927-2008) का स्वर्गवास हुआ, शमशान घाट पर जब मुखाग्नि देने का समय हुआ तब अग्नि अर्पित करने वाले महाश्य धन की जिद करने लगे,कहने लगे 5001 रु लुगा तभी अग्नि दुँगा, लोक परम्परा के मुताबिक शमशान घाट का रखवाला ही अग्नि देता है. बहरहाल काफी सौदेबाजी के बाद बात 501 पर तय हुई, बाकी के पैसे तेरहवी के दिन लेने की शर्त पर महाश्य ने अग्नि दी.
Friday, August 8, 2008
मद्धिम होते गांधी
15 अग्स्त नज्दीक आ रहा है, अखबारो मे विभिन्न सन्स्थाओ की उपस्थिति दर्ज होगी साथ मे महात्मा गान्धी (बापु) की चर्खा पर सुत काटते एक तस्वीर भी होगी, Happy Independence Day.. का एक बडा स्लोगन होगा. गान्धी वादी समाजवाद से दुर दुर तक रिशता न रखने वाले गान्धी के आदर्श पर चलने (छ्लने) की बात करते है. शायद यह इसलिए की आज भी लोगो को लगता है कि बापु की तश्वीर लगाने से ही सही होने का सर्टिफिकेट मिल जाता है(मायावतीजी से माफी चाहता हुं).
आज कल टीवी पर एक और बापु(आसारामजी बापु) बहुत ही धुम मचा रहे है, इनके आश्रम के चर्चे टीवी/अखबारो की सुर्खियां बटोर रहे है .मानव बली,सेक्स,रासलीला, गर्भवती लडकिया तमाम बाते निकल कर सामने आ रही है. "बापु "शब्द अपनी निर्मलता ,गरिमा खोता जा रहा है.इन आडम्बरी बाबाओ ने "बापु "शब्द को मलीन कर दिया है.
आज कल टीवी पर एक और बापु(आसारामजी बापु) बहुत ही धुम मचा रहे है, इनके आश्रम के चर्चे टीवी/अखबारो की सुर्खियां बटोर रहे है .मानव बली,सेक्स,रासलीला, गर्भवती लडकिया तमाम बाते निकल कर सामने आ रही है. "बापु "शब्द अपनी निर्मलता ,गरिमा खोता जा रहा है.इन आडम्बरी बाबाओ ने "बापु "शब्द को मलीन कर दिया है.
Friday, July 25, 2008
अतीत और वर्तमान
जब से होश सम्भाला है राम का नाम सुनता आया हुँ,सबसे पहले दादा /दादी/नाना/नानी से सुनता था(इनमे से कुछ लोग राम के ही पास है),फिर
धारावाहिक “रामायण “ मे राम को देखा और सुना.उसी दौरान पापाजी ने रामायण का एक संछिप्त संस्करण खरीद कर दिया था, मेरे द्वारा पुरी पढी गई पहली पुस्तक थी ,रामायण.
बाद मे राम और रामायण को विवाद और उन्माद का प्रतीक बनते देखा.सियासती हुक्मरानो ने राम का ऎसा बिभ्स्त रुप दिखाया की राम एक बस्तु(commodity) बन कर रह गये. राम मन्दिर, शिलान्यास,शिलादान,रामलला,रामसेतु आज श्रधा, सम्मान, गरिमा खो चुके है और इनका नाम विवाद का synonyms बन गया है.राम और रामायण ने जो आदर्श और परम्परा स्थापित की उस बात का जिक्र कभी सुनने को नही मिलता है. दशहरा के दिन होने वाली रामलीला ही आज जन मानस मे
राम और रामायण का अवलोकन कराती है.
अभी हाल मे ही एक प्रतिष्ठित मिडिया ग्रुप ने अपना मनोरंजन चैनल लांच किया
और रामायण को एक नए कलेवर मे पेश कर दर्शको को पेश किया जा रहा है. रामायन देखने के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मिडिया मे प्रचार किया जा रहा है.क्या इस महाकाव्य(EPIC SAGA) को पढ्ने और देखने के लिए किसी प्रचार कि जरुरत है? क्या राम और रामायण बाजार बन गए है.आज लोगो को रामायण :एक अच्छी आदत की तरह बताया जा रहा है.शायद कलयुग मे राम का नाम भी बिना मार्केटिंग के नही चलने वाला है.एकता कपुर रामायण को मात दे रही है ,राम के आदर्श तो पहले ही कुचले जा चुके है.
शायद मेरे दिल मे आज भी राम मौजुद है और इस महाकाव्य को दिल के बहुत करीब पाता हुँ, तभी तो आज भी इस काव्य को पढ्ने और देखने का मन करता है पर अपने घर मे भी राम को entry कम ही मिलती है,एकता कपुर ने राम का राम नाम सत्य कर दिया है.
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